GI Tagged Products of Chhattisgarh: Nagri Dubraj Rice, Jeeraphul, Handicrafts

By Rahul singh

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GI Tagged Products of Chhattisgarh

GI Tagged Products of Chhattisgarh : छत्तीसगढ़, जिसे भारत का “धान का कटोरा” कहा जाता है, न केवल अपनी कृषि विविधता के लिए जाना जाता है, बल्कि यह समृद्ध जनजातीय संस्कृति, अद्भुत हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं का भी संगम है। किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित होने वाले अनोखे कृषि उत्पादों और हस्तशिल्प को पहचान और कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI Tag) दिया जाता है।

भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (GI Registry) द्वारा छत्तीसगढ़ की कई कृषि किस्मों और पारंपरिक हस्तशिल्पों को GI टैग से सम्मानित किया जा चुका है। यह टैग न केवल स्थानीय उत्पादकों और कारीगरों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि वैश्विक बाजार में उनके उत्पादों की प्रामाणिकता और मांग को भी बढ़ाता है।

इस विस्तृत लेख में हम छत्तीसगढ़ के प्रमुख GI टैग प्राप्त उत्पादों—नगरी दुबराज चावल, जीराफूल चावल और बस्तर के प्रसिद्ध हस्तशिल्पों—की विशेषताओं, इतिहास और महत्व पर गहराई से चर्चा करेंगे।

जीआई टैग (GI Tag) क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

भौगोलिक संकेत (GI Tag) एक ऐसा प्रतीक है जो किसी उत्पाद को उसके विशिष्ट भौगोलिक उद्गम, गुणवत्ता, या प्रतिष्ठा के आधार पर दिया जाता है। भारत में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 के तहत चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री द्वारा यह टैग प्रदान किया जाता है।

GI टैग के प्रमुख लाभ:

  • कानूनी संरक्षण: कोई भी अन्य व्यक्ति या संस्था उस नाम का दुरुपयोग करके नकली उत्पाद नहीं बेच सकती।
  • ब्रांड वैल्यू और आर्थिक लाभ: अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजारों में उत्पाद की मांग और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं।
  • स्थानीय रोजगार: पारंपरिक किसानों और कारीगरों की आय में वृद्धि होती है, जिससे पलायन रुकता है।
  • सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक खेती और कला पद्धतियां जीवित रहती हैं।

कृषि क्षेत्र के GI टैग: छत्तीसगढ़ की सुगंधित धान की किस्में

छत्तीसगढ़ में धान की 20,000 से अधिक पारंपरिक किस्में पाई जाती हैं। इनमें से दो सबसे प्रतिष्ठित और सुगंधित किस्मों—जीराफूल और नगरी दुबराज—को GI टैग प्राप्त हो चुका है।

(A) जीराफूल चावल (Jeeraphul Rice) – पहला कृषि GI टैग

 

Jeeraphul Rice

जीराफूल (Jeeraphul) छत्तीसगढ़ का पहला कृषि उत्पाद है जिसे मार्च 2019 में आधिकारिक तौर पर GI टैग प्रदान किया गया था।

  • भौगोलिक क्षेत्र: यह मुख्य रूप से उत्तरी छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग (सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर आदि) में उगाया जाता है।

  • विशेषताएं:

  • अनोखा आकार: इसके धान का दाना अत्यंत छोटा, बारीक और जीरे के दाने के समान दिखाई देता है, इसीलिए इसे ‘जीराफूल’ कहा जाता है।
  • प्राकृतिक सुगंध: पकने पर इसकी भीनी-भीनी प्राकृतिक सुगंध पूरे घर में फैल जाती है।
  • कोमलता: पकाने के बाद इसका चावल बेहद मुलायम और सुपाच्य होता है।
  • उपयोग: जीराफूल का उपयोग पारंपरिक अवसरों, त्योहारों, खीर, पुलाव और विशेष छत्तीसगढ़ी व्यंजनों को बनाने में किया जाता है।
  • किसानों का योगदान: सरगुजा क्षेत्र के आदिवासी और स्थानीय किसान पीढ़ियों से जैविक और पारंपरिक तरीकों से इस धान का संरक्षण और उत्पादन करते आ रहे हैं।

(B) नगरी दुबराज चावल (Nagri Dubraj Rice) – छत्तीसगढ़ का बासमती

वर्ष 2023 में नगरी दुबराज को GI टैग प्रदान किया गया, जिससे यह राज्य का दूसरा कृषि उत्पाद बना जिसे यह गौरव हासिल हुआ।

  • भौगोलिक क्षेत्र: यह मुख्य रूप से धमतरी जिले के नगरी (सिहावा) क्षेत्र में उगाया जाता है। सिहावा वही ऐतिहासिक क्षेत्र है जहाँ से महानदी का उद्गम होता है।

  • विशेषताएं:

  • छत्तीसगढ़ का बासमती: अपनी असाधारण सुगंध और स्वाद के कारण इसे राज्य में “छत्तीसगढ़ का बासमती” माना जाता है।
  • मध्यम दाना: इसका दाना छोटा से मध्यम आकार का होता है और पकने के बाद यह आपस में चिपकता नहीं है।
  • धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व: स्थानीय मान्यताओं और वाल्मीकि रामायण के संदर्भों के अनुसार सिहावा क्षेत्र श्रृंगी ऋषि का आश्रम स्थल रहा है, और इस सुगंधित चावल का उपयोग प्राचीन काल से ही पूजा-अनुष्ठानों में होता रहा है।
  • महिला स्व-सहायता समूहों की भूमिका: नगरी दुबराज के संरक्षण और GI रजिस्ट्रेशन में ‘मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह’ की महिलाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई है, जिससे ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण सामने आया है।

Nagri Dubraj Rice

 

 हस्तशिल्प क्षेत्र के GI टैग: बस्तर और चांपा की समृद्ध कला

छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला और हस्तशिल्प दुनिया भर में अपनी मौलिकता, कलात्मकता और धातुकला के लिए प्रसिद्ध हैं। राज्य के 4 प्रमुख हस्तशिल्पों को GI टैग मिल चुका है:

(A) बस्तर ढोकरा (Bastar Dhokra / Bell Metal Craft)

Bastar Dhokra / Bell Metal Craft

बस्तर ढोकरा (Dhokra Art) छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध धातुकला है। यह ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ (Lost-Wax Casting Process) की प्राचीन तकनीक से बनाई जाती है, जो सिंधु घाटी सभ्यता की ‘नर्तकी की मूर्ति’ (Dancing Girl) के समय से चली आ रही है।

  • समुदाय: इसे बस्तर के घड़वा (Ghadwa) समुदाय के कारीगर बनाते हैं।

  • निर्माण प्रक्रिया:

  1. मिट्टी का एक सांचा (Core) बनाया जाता है।
  2. उस पर मोम (Beeswax) की बारीक धागेनुमा पट्टियों से डिज़ाइन उकेरी जाती है।
  3. फिर से मिट्टी का लेप लगाकर उसे सुखाया जाता है।
  4. भट्टी में गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह पिघला हुआ कांस्य/पीतल (Bell Metal) भर दिया जाता है।
  5. ठंडा होने पर बाहरी मिट्टी तोड़ दी जाती है, जिससे अद्वितीय धातु शिल्प प्राप्त होता है।
  • विशेषता: इस तकनीक में कोई जोड़ (Joint) नहीं होता और हर मूर्ति अपने आप में यूनिक (Unique) होती है क्योंकि मोम पिघलने के कारण सांचा दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

(B) बस्तर लौह शिल्प (Bastar Iron Craft / Loha Shilp)

बस्तर का लौह शिल्प कबाड़ या रीसाइकिल्ड लोहे (Scrap Iron) से बनाई जाने वाली एक अद्भुत पारंपरिक कला है।

  • समुदाय: इस शिल्प को झरिया (Jharia) जाति के कारीगर तैयार करते हैं।

  • विशेषताएं:

  • इसमें लोहे को भट्टी में गर्म करके हथौड़े से पीट-पीटकर (Forging) विभिन्न आकृतियाँ दी जाती हैं।
  • इसमें किसी भी प्रकार की वेल्डिंग (Welding) का उपयोग नहीं होता।
  • इसके द्वारा बनाए जाने वाले दीया (Lamp), हिरण, बैल, आदिवासी नर्तक और अस्त्र-शस्त्र बस्तर के दैनिक और सांस्कृतिक जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं।

(C) बस्तर काष्ठ शिल्प (Bastar Wooden Craft)

Bastar Wooden Craft

बस्तर के घने जंगलों में पाई जाने वाली सांगौन, शीशम और बीजा की लकड़ियों पर उकेरी गई नक्काशी को बस्तर वुड क्राफ्ट के रूप में GI टैग मिला हुआ है।

  • विशेषताएं:

  • लकड़ी के एकल टुकड़ों पर बारीक नक्काशी की जाती है।
  • इसमें आदिवासी देवी-देवताओं (जैसे दंतेश्वरी माई, मावली माता), वन्यजीवों, और दैनिक ग्रामीण गतिविधियों के चित्र उकेरे जाते हैं।
  • इस कला से बने मेमोरियल पिलर (खंभा), मुखौटे (Masks), और सजावटी सामान काफी लोकप्रिय हैं।

(D) चांपा सिल्क साड़ियां एवं फैब्रिक (Champa Silk)

चांपा सिल्क साड़ियां एवं फैब्रिक (Champa Silk)

जांजगीर-चांपा जिले का चांपा सिल्क अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के कोसा सिल्क (Tussar Silk) के लिए भारत और विदेशों में प्रसिद्ध है।

  • विशेषताएं:

  • प्राकृतिक कोसा (शहतूत या अर्जुन/साल के पेड़ों पर पलने वाले रेशम कीटों के कोकून) से धागा निकाला जाता है।
  • चांपा के बुनकर (Devangan community) पारंपरिक हथकरघा (Handloom) पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके साड़ियां और कपड़े तैयार करते हैं।
  • इसकी प्राकृतिक सुनहरी चमक और मजबूती इसे अन्य रेशमों से अलग बनाती है।
  • छत्तीसगढ़ के सभी GI टैग प्राप्त उत्पादों की सूची
क्र. उत्पाद का नाम श्रेणी (Category) प्रमुख क्षेत्र GI प्राप्त वर्ष
1 जीराफूल (Jeeraphul) कृषि (Agriculture) सरगुजा / सूरजपुर 2019
2 नगरी दुबराज (Nagri Dubraj) कृषि (Agriculture) धमतरी (नगरी) 2023
3 बस्तर ढोकरा (Bastar Dhokra) हस्तशिल्प (Handicraft) बस्तर संभाग 2008
4 बस्तर लौह शिल्प (Bastar Iron Craft) हस्तशिल्प (Handicraft) बस्तर संभाग 2008
5 बस्तर काष्ठ शिल्प (Bastar Wooden Craft) हस्तशिल्प (Handicraft) बस्तर संभाग 2008
6 चांपा सिल्क साड़ियां (Champa Silk) वस्त्र/हस्तशिल्प (Textile) जांजगीर-चांपा 2010

 

अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक संरक्षण पर प्रभाव

GI टैग मिलने से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं:

  1. आदिवासी कारीगरों का सशक्तिकरण: बस्तर के ढोकरा और लोहा शिल्पकारों को राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेलों (जैसे सूरजकुंड मेला, दिल्ली हाट) में सीधी पहुंच मिली है, जिससे उन्हें उनके काम का सही मूल्य मिल रहा है।

  2. जैविक खेती को बढ़ावा: जीराफूल और नगरी दुबराज जैसी किस्मों को प्रीमियम मूल्य (Premium Price) मिलने से किसान रसायनों के स्थान पर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं।

  3. पर्यटन (Ecotourism & Cultural Tourism): छत्तीसगढ़ के GI टैग उत्पादों ने राज्य की एक नई सांस्कृतिक पहचान बनाई है, जिससे बस्तर और सरगुजा क्षेत्रों में हस्तशिल्प पर्यटन को बढ़ावा मिला है।

GI Tagged Products of Chhattisgarh

Rahul singh

CG Latest Update was founded and is personally managed by Rahul Singh, a seasoned career consultant with over 11 years of extensive experience in tracking government recruitments, analyzing exam trends, and decoding complex educational notifications. Having spent more than a decade closely monitoring the state’s recruitment boards (such as CGPSC and CG Vyapam), Rahul noticed a critical gap: thousands of students, especially in rural and remote parts of Chhattisgarh, were missing career opportunities due to scattered PDFs or misleading information. To bridge this gap, Rahul established this portal as a unified, transparent repository of verified facts. Experience: 11+ Years in Job Portal Management & Career Guidance Expertise: Chhattisgarh Civil Services Rules, Contractual (Samvida) Recruitment Frameworks, and Academic Evaluation Timelines. Core Vision: To eliminate information asymmetry, helping local youth access genuine livelihood opportunities safely and securely.

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